क्या दलित होना अपराध है ? प्रकृति
ने मनुष्य को जन्म देते समय कोई भेद-भाव नहीं किया जैसे कुलीन जाति के बच्चों को जितनी
शक्ति दी उतनी ही दलित बच्चे को, जब प्रकृति ने कोई भेद नही की तो हम क्यों करते हैं यह सब ? दलितों से बेगार का काम लेना बडी जातियों के धर्म भ्रष्ट नही होते लेकिन वहीं अगर उनके कुंए का पानी पी ले तो छुआ-छुत मानेंगे. यह कैसा न्याय है, दलितों को नीच जाति का कह उनपर अत्याचार होता रहे, अत्याचार
भी वह करें जो खुद को बडी जाति का कुलीन और सभ्य कह्ते हैं. कमजोरों पर अत्याचार करते वक्त इन सभ्य और खुद को बडा मानने वालों का दिल क्यों
नहीं पसीजता ?
इन्हीं सवालों पर केन्द्रित नाटक “सद्गति”
का मंचन २३ सितम्बर को अम्बेदकर कॉलोनि में एवं २६ सितम्बर २०१४ को प्रेमचन्द रंगशाला परिसर में किया गया. “रंगसृष्टि” ने इसे ‘नुक्क्ड
नाट्य सृखला’ की एक कडी के रुप में किया. ‘रंगसृष्टि’ के
पदाधिकारि एवं कलकार मानते हैं कि यह सिर्फ एक आगाज है. समाज में व्याप्त हर मुद्दे
पर चोट करना जरुरी है. समाज में नुक्क्ड नाटक के जरीये समाज को सजग और जागरुक किया
जा सकता है. ‘सद्गाति’ नाटक के निर्देशक
सनत कुमार नुक्कड नाटकों में लगातार प्रयोग करते नजर आते हैं. इस प्रयोग के सन्दर्भ
में अभी बात करना शायद उचित ना हो. नुक्क्ड नाटकों मे सेटस, कॉस्ट्युम, फोक एलिमेंट्स
के विभिन्न शैलियों का इस्तेमाल कर लोक मनोरंजक तरीके से प्रस्तुति की जाती है. इस
शैली के सम्बंध मे हम बाद में चर्चा करेंगे.
पकडो, पकडो की क्रुर आवाज़ के साथ बचाओ, बचाओ की करुण पुकार और फिर
ठाकुर के लठैतों द्वारा दलित को दिया जा रहा दंड़ कई सवालों को जन्म देती है. दलित
जाति से आने वाला हरखू बेहद ही बिमार और प्यासा है. उसे पानी पिलाने के लिए उसका बेटा
झरखू गॉव में ठाकूर के कूऑ से पानी चुराकर लाने जाता है, क्योंकि दलितों के टोले में
जो कुंऑ है उस में कुत्ता मरा हुआ है.
पानी लेने गए झरखु को ठाकुर पकड़ लेता है और कुंए से पानी लेने के जुर्म में उसे बेरहमी से मारता-पीटता है. इससे भी मन नाहीं भरता तो पंड़ित दतादीन के पास दंड़ देने के लिए भेज देता है. उधर प्यास से तड़पता झरखु का बाप हरखु मर जाता है. पंड़ित दतादीन वर्ण व्यवस्था मे उच्च जाति के बरवरता के प्रतीक के रुप मे है. पंड़ित दतादीन झरखू से अपने यहॉ दिन भर अपने घर पर घास काटने, गोवर उठाने, बोझा उठाने लकड़ी चीड़ने समेत कई काम करवाता है, वह भी बीना कुछ खाना-पीना दिए हुए. भूखा-प्यासा काम कर रहा झरखू खाने के लिए मांगता है तो उसे मिलती है दुत्कार, गालियां और अपमान. अंतः भुखा- प्यासा झरखू अत्याधिक मेहनत करने के कारण मर जाता है.
पानी लेने गए झरखु को ठाकुर पकड़ लेता है और कुंए से पानी लेने के जुर्म में उसे बेरहमी से मारता-पीटता है. इससे भी मन नाहीं भरता तो पंड़ित दतादीन के पास दंड़ देने के लिए भेज देता है. उधर प्यास से तड़पता झरखु का बाप हरखु मर जाता है. पंड़ित दतादीन वर्ण व्यवस्था मे उच्च जाति के बरवरता के प्रतीक के रुप मे है. पंड़ित दतादीन झरखू से अपने यहॉ दिन भर अपने घर पर घास काटने, गोवर उठाने, बोझा उठाने लकड़ी चीड़ने समेत कई काम करवाता है, वह भी बीना कुछ खाना-पीना दिए हुए. भूखा-प्यासा काम कर रहा झरखू खाने के लिए मांगता है तो उसे मिलती है दुत्कार, गालियां और अपमान. अंतः भुखा- प्यासा झरखू अत्याधिक मेहनत करने के कारण मर जाता है.
आज के सामाजिक परिवेश मे देखें तो बढ़ते वर्गभेद और जातिगत भेदभाव
को मिटाने के प्रयास में यह काफी सार्थक नाट्य प्रदर्शन है, इसमें एक तरफ जहां शोषितों
के दर्द को दर्शाया गया वहीं दूसरी तरफ इसे ख़त्म कर सामाजिक सद्भाव स्थापित करने की
प्रेरणा भी दी गयी.
नाटक मे स्वाति किरण, निमिषा नमन, हर्ष वर्धन, दिवाकर कुमार शर्मा, जीवन कुमार, धीरज कुमार, ज्योतीन्द्र, नंदन पाण्डेय, पप्पू कुमार, अमित कुमार, मोनी कुमारी आदि ने उत्कृष्ट अभिनय का प्रदर्शन किया.
नाटक मे स्वाति किरण, निमिषा नमन, हर्ष वर्धन, दिवाकर कुमार शर्मा, जीवन कुमार, धीरज कुमार, ज्योतीन्द्र, नंदन पाण्डेय, पप्पू कुमार, अमित कुमार, मोनी कुमारी आदि ने उत्कृष्ट अभिनय का प्रदर्शन किया.






सुन्दर प्रयास। जारी रहे यह यात्रा।
ReplyDeleteआप ने इसका जिक्र तक नहीं किया - 'टिकारी से दलितों को भागने के खिलाफ' मे इस प्रदर्शन का आयोजन किया गया था. बाकि सब ठीक है. आप का बहुत बहुत धन्यवाद...
ReplyDeletesundar atisundar .... pryas jaari rahe
ReplyDeleteयह कार्य निश्चित तौर पर सराहनीय कार्य है पर उतना जोखिम भरा है...
ReplyDeleteहोशियार रहीयेगा. शुभकामना