सफ़दर हाश्मी के जन्मदिन पर मनाया जाने वाला दिन। रंगकर्मी इस दिन को "भारतीय नुकक्ड दिवस" के रूप में मनाये हैं। सफ़दर जो दुनियां में ऐसे एकलौते व्यक्ति थे जिन्होंने नुक्कड़ नाटकों का एक श्रिंखला बनाया और 4000 प्रस्तुति कर जन सरोकार वाले मुद्दों को उठाया। ऐसे महान व्यक्तिव को "हाला बोल" नामक नाटक करते हुए गोली मार दी गई। तब से भारतीय रंगमंच इस महान विभूति की याद में "भारतीय नुक्कड़ नाटक दिवस" मनाता आया है। बिहार के रंगकर्मियों को खासा लगाव रहा है सफ़दर हाशमी से तो आज के दिन इन्हें कैसे भुला जा सकता है। यूँ भी सालो भर इनके याद में कार्यक्रम चलता रहता है।
सभी रंगकर्मियों और रंगचिंतकों की तरफ से सफ़दर हाश्मी को नमन ।
"भारतीय नुक्कड़ नाटक दिवस" के अवसर पे न्यू निर्मित संगठन "द स्टगलर्स" की नुकक्ड नाट्य प्रस्तुति "करप्शन इन एजुकेशन" का मंचन उत्तम कुमार के निर्देशन में किया गया। नुक्कड़ नाटक की एक परंपरा के रूप में जोगीरा का बहुत बड़ा महत्त्व है। और जनता को एकत्रित करने और उन्हें आकर्षित करने का उपयुक्त माध्यम भी। जोगीरा शुरू हुआ की अचानक ग्रुप के सभी सदस्य नुक्कड़ के गोलार्ध में उतर कहने लगे की नाटक नहीं होगा। सभी हतप्रभ । अपने अलग अंदाज में लोगों ने गायन शुरू किया। यह गायन कोरियन भाषा के तर्ज पर शुरू हुआ फिर नाटक देखने को आवाहन की गूंज बन गई। फिर कबीर के दोहे, कभी लोक धुन में। कुल मिलाकर कहा जा सकता है की ऐसा रंगसंगीत का निर्माण हो रहा था जो रंगकोलाज से गुजरते हुए रंगकर्मियों के भावनाओं का प्रकटीकरण के रूप में विकसित हो गया। "द स्टगलर्स" को सुनना और देखना मजेदार लगा। सराहनीय प्रयास।
नाटक में जोश के साथ होश भी दिखा। इस नाटक का देखते हुए आनन्द से मन गद गद हो गया। शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुक्त आवाज है यह। वैश्वीकरण के इस दौर में शिक्षा के प्रसार में विश्व बैंक के प्रभाव को भारतीय समाज को कुंद करने की साजिश का व्यापक अर्थ देता है यह नाटक। ग्रुप के सभी अभिनेताओं ने अपने इमानदार कोशिश की। रौशन, कुंदन, रोहित, राहुल, कौशिक, सत्या, उत्तम आदि ये नाम है अभिनेताओं का।
मैं कहना चाहूँगा नव निर्देशकों से और नए अभिनेताओं से की इसे कहते है प्रदर्शन और अभिनय। सिखाना होगा इनसे भी। मैं धन्यवाद देता हूँ इस नए ग्रुप के सभी साथियों को की आप ने हमारी और दर्शकों की अस्वाद से आक्शादित कर दिया। चलते चलते कहूँगा की वस्त्र विन्यास भी प्रभावी था। संगीत भी नाटक का जबरदस्त हिस्सा था। आप सबों के जज्बे को सलाम।
हाँ एक बात और इतना करने पर भी आपस में रिहर्सल की कमी को लेकर बेचैन दिखे लोग।
आज इन्ही जैसे जोशीले और उत्साहित लोगों की आवश्यकता है रंगमंच को। मैं काफी आशान्वित हूँ।








