Saturday, September 20, 2014

करप्शन इन एजुकेशन


सफ़दर हाश्मी के जन्मदिन पर मनाया जाने वाला दिन। रंगकर्मी इस दिन को "भारतीय नुकक्ड दिवस" के रूप में मनाये हैं। सफ़दर जो दुनियां में ऐसे एकलौते व्यक्ति थे जिन्होंने नुक्कड़ नाटकों का एक श्रिंखला बनाया और 4000 प्रस्तुति कर जन सरोकार वाले मुद्दों को उठाया। ऐसे महान व्यक्तिव को "हाला बोल" नामक नाटक करते हुए गोली मार दी गई। तब से भारतीय रंगमंच इस महान विभूति की याद में "भारतीय नुक्कड़ नाटक दिवस" मनाता आया है। बिहार के रंगकर्मियों को खासा लगाव रहा है सफ़दर हाशमी से तो आज के दिन इन्हें कैसे भुला जा सकता है। यूँ भी सालो भर इनके याद में कार्यक्रम चलता रहता है। 
सभी रंगकर्मियों और रंगचिंतकों की तरफ से सफ़दर हाश्मी को नमन ।
"भारतीय नुक्कड़ नाटक दिवस" के अवसर पे न्यू निर्मित संगठन "द स्टगलर्स" की नुकक्ड नाट्य प्रस्तुति "करप्शन इन एजुकेशन" का मंचन उत्तम कुमार के निर्देशन में किया गया। नुक्कड़ नाटक की एक परंपरा के रूप में जोगीरा का बहुत बड़ा महत्त्व है। और जनता को एकत्रित करने और उन्हें आकर्षित करने का उपयुक्त माध्यम भी। जोगीरा शुरू हुआ की अचानक ग्रुप के सभी सदस्य नुक्कड़ के गोलार्ध में उतर कहने लगे की नाटक नहीं होगा। सभी हतप्रभ । अपने अलग अंदाज में लोगों ने गायन शुरू किया। यह गायन कोरियन भाषा के तर्ज पर शुरू हुआ फिर नाटक देखने को आवाहन की गूंज बन गई। फिर कबीर के दोहे, कभी लोक धुन में। कुल मिलाकर कहा जा सकता है की ऐसा रंगसंगीत का निर्माण हो रहा था जो रंगकोलाज से गुजरते हुए रंगकर्मियों के भावनाओं का प्रकटीकरण के रूप में विकसित हो गया। "द स्टगलर्स" को सुनना और देखना मजेदार लगा। सराहनीय प्रयास।
नाटक में जोश के साथ होश भी दिखा। इस नाटक का देखते हुए आनन्द से मन गद गद हो गया। शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुक्त आवाज है यह। वैश्वीकरण के इस दौर में शिक्षा के प्रसार में विश्व बैंक के प्रभाव को भारतीय समाज को कुंद करने की साजिश का व्यापक अर्थ देता है यह नाटक। ग्रुप के सभी अभिनेताओं ने अपने इमानदार कोशिश की। रौशन, कुंदन, रोहित, राहुल, कौशिक, सत्या, उत्तम आदि ये नाम है अभिनेताओं का। 
मैं कहना चाहूँगा नव निर्देशकों से और नए अभिनेताओं से की इसे कहते है प्रदर्शन और अभिनय। सिखाना होगा इनसे भी। मैं धन्यवाद देता हूँ इस नए ग्रुप के सभी साथियों को की आप ने हमारी और दर्शकों की अस्वाद से आक्शादित कर दिया। चलते चलते कहूँगा की वस्त्र विन्यास भी प्रभावी था। संगीत भी नाटक का जबरदस्त हिस्सा था। आप सबों के जज्बे को सलाम।
हाँ एक बात और इतना करने पर भी आपस में रिहर्सल की कमी को लेकर बेचैन दिखे लोग। 
आज इन्ही जैसे जोशीले और उत्साहित लोगों की आवश्यकता है रंगमंच को। मैं काफी आशान्वित हूँ।

"अम्बेदकर और गाँधी"


आज नाटक देखा । और यह तय कर पाने में अपने को असक्षम पाया की पहले किसकी बात करूँ। नाटक की, उसके आलेख की या अभिनय की ? क्योंकि अपने मित्रों को नाटक के बारे में लिखने की प्रेरणा देता हूँ और यह कहता हूँ कि सिर्फ अभिनय और प्रस्तुति के बारे में लिखें बेवाकी से । ताकि रंगमंच में एक क्रांति आये अच्छे नाटकों को लेकर। तो बात की गंभीरता का अनुमान स्वतः ही हो गया होगा। और मेरी उलझन का भी। चलिए पहले अभिनय से शुरुआत करते हैं - नाटक की शुरुआत बुल्लू के आगमन से होता है जो खुद को संतोष मेहरा बताते हैं। बुल्लू के अभिनय में एक तरह के ठहराओ का वक्त चल रहा है। मैं ऐसा इस लिए कह सकता हूँ क्योंकि लगातार एक ही तरह के संवाद अदायगी, कैरेक्टर में नहीं घुल पाने की जद्दोजहद, प्रॉप्स के हैंडलिंग में व्यवधान हो जाना, लगभग नाटकों में हो रहा है। दुसरे अभिनेता विवेक कुमार जो अम्बेदकर की भूमिका में थे। इनका अभिनय अम्बेदकर के भ्रम को स्थापित कर रहा था। इस पुरे नाटक में अम्बेदकर की भूमिका को सभी ने पसंद किया। बाकि के पात्र कभी कुछ तो कभी कुछ बन कर आरहे थे जो इस प्रस्तुति के अनुरूप नहीं प्रतीत हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था की जबरदस्ती की गई है अभिनेताओं के साथ। अभी अभी अम्बेदकर के पिता तुरंत साइमन कमीशन के रूप में । वस्त्र भी बदल नहीं पाए थे की उन्हें मंच पर आना पड़ा। मलेट्री में अम्बेदकर के साथ जब छुआ छुत हो रहा था तो लोग जिस तरह से आये और उनका उस समय जो आवरण था उससे मलेट्री के नहीं प्रतीत हो रहे थे। इस लिए बगल के सीट पर बैठे महानुभाव कह उठे की ऐसे थोड़े मलेट्री के लोग होते हैं। मैंने उन्हें चुप कराया और कहा नाटक के बाद में इसकी चर्चा करें। 
बाकि यह प्रतीत होना स्वाभाविक था की नाटक में काफी जानकार अभिनेता का होना और नाटक का ऐसा हश्र होना इस और तो जरुर संकेत करती है की नेत्रित्व कर्त्ता को अभी सिखने की हीं आवश्यकता है। नाट्य निर्देशन कोई बच्चों का खेल नहीं है जो जब मन किया और खेल गए। 
नट्यालेख के सन्दर्भ में इतना जरुर कहूँगा की अम्बेदकर और गाँधी में गांधी की क्या भूमिका थी ? क्या गाँधी और अम्बेदकर के विचारों को प्रतिपादित किया गया ? इसमें बड़े ही गंदे तरीके से अम्बेदकर के जीवन को भी दिखाया गया। संतोष मेहरा जी आप को अभी अम्बेदकर और गाँधी जी के विचारों को और जानने की जरुरत है। क्या यह स्क्रिप्ट दोनों के विचारों को लेकर कोई विमर्श उत्पन्न करता है ?
संगीत क्यों था इस नाटक में यह शोध का विषय है। उसकी उपयोगिता क्या थी यह मेरे समझ के परे था। शायद यह निर्देशक का पक्ष है। पिछले दिनों कंजूस के मंचन के समय भी यही देखा था। दोनों नाटकों में यह समानता अकारण ही आगया होगा शायद। नाटक में संगीत को चीनी की तरह घुल जाना चाहिए पर यह पानी और पत्थर की तरह अलग हो गया। निर्देशक नाटक को एक धारा नहीं दे पाए। मुझे इसकी शैली भी समझ नहीं आई। शायद कोई नई शैली की खोज हो...
वस्त्र विन्यास से खासा आपति है। शायद जुगाडू वस्त्र विन्यास था। जब जुगाडू विन्यास करेंगे तो प्रभाव भी जुगाडू ही होगा। जब जुगाडू व्यवस्था से ही नाटक करना था तो सरकार से अनुदान की जरुरत क्यों ? यह पैसा इस लिए दिया जाता है की इसका उपयोग कर नाट्य प्रस्तुति को बेहतर से बेहतर बनाया जा सके। 
बाकी सब ठीक है ........
आप तमाम युवाओं से हमें बड़ी उम्मीद है । आप बेहतर कर सकते है। रंगमंच को नई उचाई प्रदान कर सकते है। 
"का चुप साध बैठे हनुमाना" (यह संवाद जामवंत ने हनुमान से कही थी। जब समंदर को एक छलांग में पार करना था और हनुमान भी बलहीन की तरह टुकुर-टुकुर देख रहे थे।)