आज नाटक देखा । और यह तय कर पाने में अपने को असक्षम पाया की पहले किसकी बात करूँ। नाटक की, उसके आलेख की या अभिनय की ? क्योंकि अपने मित्रों को नाटक के बारे में लिखने की प्रेरणा देता हूँ और यह कहता हूँ कि सिर्फ अभिनय और प्रस्तुति के बारे में लिखें बेवाकी से । ताकि रंगमंच में एक क्रांति आये अच्छे नाटकों को लेकर। तो बात की गंभीरता का अनुमान स्वतः ही हो गया होगा। और मेरी उलझन का भी। चलिए पहले अभिनय से शुरुआत करते हैं - नाटक की शुरुआत बुल्लू के आगमन से होता है जो खुद को संतोष मेहरा बताते हैं। बुल्लू के अभिनय में एक तरह के ठहराओ का वक्त चल रहा है। मैं ऐसा इस लिए कह सकता हूँ क्योंकि लगातार एक ही तरह के संवाद अदायगी, कैरेक्टर में नहीं घुल पाने की जद्दोजहद, प्रॉप्स के हैंडलिंग में व्यवधान हो जाना, लगभग नाटकों में हो रहा है। दुसरे अभिनेता विवेक कुमार जो अम्बेदकर की भूमिका में थे। इनका अभिनय अम्बेदकर के भ्रम को स्थापित कर रहा था। इस पुरे नाटक में अम्बेदकर की भूमिका को सभी ने पसंद किया। बाकि के पात्र कभी कुछ तो कभी कुछ बन कर आरहे थे जो इस प्रस्तुति के अनुरूप नहीं प्रतीत हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था की जबरदस्ती की गई है अभिनेताओं के साथ। अभी अभी अम्बेदकर के पिता तुरंत साइमन कमीशन के रूप में । वस्त्र भी बदल नहीं पाए थे की उन्हें मंच पर आना पड़ा। मलेट्री में अम्बेदकर के साथ जब छुआ छुत हो रहा था तो लोग जिस तरह से आये और उनका उस समय जो आवरण था उससे मलेट्री के नहीं प्रतीत हो रहे थे। इस लिए बगल के सीट पर बैठे महानुभाव कह उठे की ऐसे थोड़े मलेट्री के लोग होते हैं। मैंने उन्हें चुप कराया और कहा नाटक के बाद में इसकी चर्चा करें।
बाकि यह प्रतीत होना स्वाभाविक था की नाटक में काफी जानकार अभिनेता का होना और नाटक का ऐसा हश्र होना इस और तो जरुर संकेत करती है की नेत्रित्व कर्त्ता को अभी सिखने की हीं आवश्यकता है। नाट्य निर्देशन कोई बच्चों का खेल नहीं है जो जब मन किया और खेल गए।
नट्यालेख के सन्दर्भ में इतना जरुर कहूँगा की अम्बेदकर और गाँधी में गांधी की क्या भूमिका थी ? क्या गाँधी और अम्बेदकर के विचारों को प्रतिपादित किया गया ? इसमें बड़े ही गंदे तरीके से अम्बेदकर के जीवन को भी दिखाया गया। संतोष मेहरा जी आप को अभी अम्बेदकर और गाँधी जी के विचारों को और जानने की जरुरत है। क्या यह स्क्रिप्ट दोनों के विचारों को लेकर कोई विमर्श उत्पन्न करता है ?
संगीत क्यों था इस नाटक में यह शोध का विषय है। उसकी उपयोगिता क्या थी यह मेरे समझ के परे था। शायद यह निर्देशक का पक्ष है। पिछले दिनों कंजूस के मंचन के समय भी यही देखा था। दोनों नाटकों में यह समानता अकारण ही आगया होगा शायद। नाटक में संगीत को चीनी की तरह घुल जाना चाहिए पर यह पानी और पत्थर की तरह अलग हो गया। निर्देशक नाटक को एक धारा नहीं दे पाए। मुझे इसकी शैली भी समझ नहीं आई। शायद कोई नई शैली की खोज हो...
वस्त्र विन्यास से खासा आपति है। शायद जुगाडू वस्त्र विन्यास था। जब जुगाडू विन्यास करेंगे तो प्रभाव भी जुगाडू ही होगा। जब जुगाडू व्यवस्था से ही नाटक करना था तो सरकार से अनुदान की जरुरत क्यों ? यह पैसा इस लिए दिया जाता है की इसका उपयोग कर नाट्य प्रस्तुति को बेहतर से बेहतर बनाया जा सके।
बाकी सब ठीक है ........
आप तमाम युवाओं से हमें बड़ी उम्मीद है । आप बेहतर कर सकते है। रंगमंच को नई उचाई प्रदान कर सकते है।
"का चुप साध बैठे हनुमाना" (यह संवाद जामवंत ने हनुमान से कही थी। जब समंदर को एक छलांग में पार करना था और हनुमान भी बलहीन की तरह टुकुर-टुकुर देख रहे थे।)














