Tuesday, October 7, 2014

गोवा का लोकनाट्य

१'त्रियात्र' : गोवा का अनोखा लोकनाट्य                                                                   -सूर्यकांत जोशी

भौगोलिक दृष्टि से यद्यपि गोवा भारत का सबसे छोटा राज्‍य है, तो भी सांस्‍कृतिक विशेषताओं से यह बहुत ही समृद्ध है। यहाँ भारतीय और पाश्चिमात्‍य संस्‍कृतियों का खूबसूरत मिलाप हुआ है। गोवा के लोकजीवन में नाट्य कला का एक विशेष स्‍थान है। गोमांतकीय लोकनाट्य के क्षेत्र में अलग-अलग प्रकृति घटक, लोकशैलियों का अंतर्भाव हुआ है। मुख्‍य रूप से यहाँ नकाबों का उपयोग करके प्रस्‍तुत किया जानेवाला 'पेरणी जागर' दशावतार के विषय पर आधारित 'काला', रामायण की कथाओं पर आधारित 'रणमाले' और सामाजिक विषयों पर आधारित 'गावड़ा जागरण' - ऐसे चार प्रकृति के लोकनाट्य प्रकार देखने को मिलते हैं। इसके अलावा लोकनाट्य की परिभाषा से जरा हटकर किंतु प्रस्‍तुतीकरण के हिसाब से तथा यहाँ के लोकजीवन के साथ समन्‍वय रखने वाला 'तियात्र' नाम का लोकनाट्य प्रकार यहाँ मशहूर है।

'तियात्र' नाट्यप्रकार गोमांतकीय ख्रिस्‍ती लोकजीवन के मनोरंजन का एक साधन है। 'तियात्र' पूर्णरूप से गद्य नाटक नहीं है, फिर भी यह गोवा प्रदेश के रंगमंच का अविभाज्‍य अंग बन गया है। इसमें गाए जाने वाले गीत और नाटक की कहानी का एक दूसरे से कोई संबंध नहीं होता। ऐसा माना जाता है कि इटालियन आपेरा और लोकनाट्य 'गावड़ा जागर' इन दोनों के मिलाप से इस नाट्य प्रकार की र्नि‍मिती हुई है। ऐसे अलग किस्‍म के लोकनाट्य का जन्‍म करीब सौ साल पहले सन १८९२ में मुंबई में हुआ। 'इटालियन भुरगो' इस नाम से तियात्र का प्रथम सादरीकरण लुकाझिन रिबेरो ने मुंबई के न्‍यू आल्‍फ्रेड थियेटर में किया था। अगस्तिन फर्नांडिस नाम के उस समय के मशहूर रंगकर्मी ने 'तियात्र' को लोकप्रिय बनाने 
में बहुत बड़ा योगदान दिया। इसके बाद बहुत कठिनाइयों से गुजरते हुए आज तियात्र, गोवा के प्रादेशिक रंगमंच का एक हिस्‍सा बन गया है।

'खे‍ल तियात्र' और 'तियात्र' ये तियात्र के दो उप प्रकार हैं। दोनों में प्रस्‍तुतिकरण के अलावा ज्‍यादा कोई फर्क नहीं है। 'खेल तियात्र' पुराना है और मराठी रंगभूमि के संगीत नाटक से मिलता जुलता है। इसमें गाने ज्‍यादा होते थे और परिकथा, अमानवी शक्ति, अद्भुत विषयों पर कथाएँ प्रस्‍तुत की जाती थी। इसमें मुद्रा अभिनय से शारीरिक अभिनय को ज्‍यादा महत्‍व दिया जाता था। लोगों का मनोरंजन करना इसका मुख्‍य उद्देश्‍य था। जैसे जैसे समय बीतता गया, 'खेळ तियात्र' पीछे पड़ता गया और तियात्र का आज का प्रकट रूप उभरकर सामने आ गया। 'खेळ तियात्र' का सादरीकरण आज भी गोवा के सासष्‍टी तालुका में कई जगहों पर किया जा रहा है।

तियात्र पाँच, छ: या सात खंडों में बँटा होता है। हर एक खंड को 'पड्डो' कहा जाता है। प्रत्‍येक 'पड्डो' में एक कथा/कहानी होती है। दूसरे नाटकों की तरह सुख, दु:ख, हँसी, रोने जैसी मानवी भावनाओं का प्रस्‍तुतीकरण इसमें होता है। दो पड्डों के बीच में तीन-चार गीत होते हैं जिनको 'कातार' कहते हैं। ये गाने ज्‍यादातर समूह में गाए जाते हैं। अगर दो गायक इसे गाते हैं तो उसे 'दुवो' या 'दुयेट' कहा जाता है। तीन या चार गायक जब मिलक गाते हैं तो उसे 'त्रियो' या 'क्‍वार्टेट' कहतेहैं। साथ में जो संगीत बजता है उसमें क्‍लैरेनेट, ट्रंपेट ड्रम जैसे पाश्चिमात्‍य वाद्यों का उपयोग किया जाता है। तियात्र में प्रॉम्‍पटर की सहायता भी ली जाती है। तियात्र के कथासूत्र में सामाजिक विषयों पर उपहासात्‍मक चर्चा की जाती है।
कलाकार अपनी भूमिका से बाहर आ कर गीत गाने में शामिल हो जाता है और गीत समाप्‍त होने पर पुन: अपनी भूमिका में घुलमिल जाता है। तियात्र यथार्थवादी होता है और सहजता तथा सीधापन इसके विशेष पहलू हैं। ऐसा अनोखा 'तियात्र' गोवा के ख्रिस्‍ती लोक जीवन का एक महत्‍वपूर्ण अंग है और कोंकणी भाषा में रंजन का लोकप्रिकय साधन है।

Friday, October 3, 2014

नाटक ‘‘सदगति’’ के प्रदर्शन मे तड़प है

नाटक ‘‘सदगति’’ दलितों पर हो रहे अत्याचार, शोषण, भेदभाव एवं छुआ-छुत का प्रकटिकरण है.


क्या दलित होना अपराध है ? प्रकृति ने मनुष्य को जन्म देते समय कोई भेद-भाव नहीं किया जैसे कुलीन जाति के बच्चों को जितनी शक्ति दी उतनी ही दलित बच्चे को, जब प्रकृति ने कोई भेद नही की तो हम क्यों करते हैं यह सब ? दलितों से बेगार का काम लेना बडी जातियों के धर्म भ्रष्ट नही होते लेकिन वहीं अगर उनके कुंए का पानी पी ले तो छुआ-छुत मानेंगे. यह कैसा न्याय है, दलितों को नीच जाति का कह उनपर अत्याचार होता रहे, अत्याचार भी वह करें जो खुद को बडी जाति का कुलीन और सभ्य कह्ते हैं. कमजोरों पर अत्याचार करते वक्त इन सभ्य और खुद को बडा मानने वालों का दिल क्यों नहीं पसीजता ?
      इन्हीं सवालों पर केन्द्रित नाटक “सद्गति” का मंचन २३ सितम्बर को अम्बेदकर कॉलोनि में एवं २६ सितम्बर २०१४ को प्रेमचन्द रंगशाला परिसर में किया गया. “रंगसृष्टि” ने इसे ‘नुक्क्ड नाट्य सृखला’ की एक कडी के रुप में किया. ‘रंगसृष्टि’ के पदाधिकारि एवं कलकार मानते हैं कि यह सिर्फ एक आगाज है. समाज में व्याप्त हर मुद्दे पर चोट करना जरुरी है. समाज में नुक्क्ड नाटक के जरीये समाज को सजग और जागरुक किया जा सकता है. ‘सद्गाति’ नाटक के निर्देशक सनत कुमार नुक्कड नाटकों में लगातार प्रयोग करते नजर आते हैं. इस प्रयोग के सन्दर्भ में अभी बात करना शायद उचित ना हो. नुक्क्ड नाटकों मे सेटस, कॉस्ट्युम, फोक एलिमेंट्स के विभिन्न शैलियों का इस्तेमाल कर लोक मनोरंजक तरीके से प्रस्तुति की जाती है. इस शैली के सम्बंध मे हम बाद में चर्चा करेंगे.

    बहरहाल ! प्रेमचंद के दो कहानीयों (सद्गति एवं ठाकुर का कुंआ) पर अधारित  इस नाटक के लेखक अनिल ओझा ने यह सवाल उठाया कि क्यों हजारों वर्षों से जाति के नाम पर अमान्वीय व्यव्हार होता आया है ? नाटक के प्रदर्शन से यह स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में यह शोषण आज भी बरकरार है. वर्ण व्यवस्था में दलितों की हालत और उनकी जीवन गति को समझाता यह नाटक दलित विमर्श पर लिखी गयी एक महत्वपुर्ण नाटक है.
पकडो, पकडो की क्रुर आवाज़ के साथ बचाओ, बचाओ की करुण पुकार और फिर ठाकुर के लठैतों द्वारा दलित को दिया जा रहा दंड़ कई सवालों को जन्म देती है. दलित जाति से आने वाला हरखू बेहद ही बिमार और प्यासा है. उसे पानी पिलाने के लिए उसका बेटा झरखू गॉव में ठाकूर के कूऑ से पानी चुराकर लाने जाता है, क्योंकि दलितों के टोले में जो कुंऑ है उस में कुत्ता मरा हुआ है.
पानी लेने गए झरखु को ठाकुर पकड़ लेता है और कुंए से पानी लेने के जुर्म में उसे बेरहमी से मारता-पीटता है. इससे भी मन नाहीं भरता तो पंड़ित दतादीन के पास दंड़ देने के लिए भेज देता है. उधर प्यास से तड़पता झरखु का बाप हरखु मर जाता है. पंड़ित दतादीन वर्ण व्यवस्था मे उच्च जाति के बरवरता के प्रतीक के रुप मे है. पंड़ित दतादीन झरखू से अपने यहॉ दिन भर अपने घर पर घास काटने, गोवर उठाने, बोझा उठाने लकड़ी चीड़ने समेत कई काम करवाता है, वह भी बीना कुछ खाना-पीना दिए हुए. भूखा-प्यासा काम कर रहा झरखू खाने के लिए मांगता है तो उसे मिलती है दुत्कार, गालियां और अपमान. अंतः भुखा- प्यासा झरखू अत्याधिक मेहनत करने के कारण मर जाता है. 
आज के सामाजिक परिवेश मे देखें तो बढ़ते वर्गभेद और जातिगत भेदभाव को मिटाने के प्रयास में यह काफी सार्थक नाट्य प्रदर्शन है, इसमें एक तरफ जहां शोषितों के दर्द को दर्शाया गया वहीं दूसरी तरफ इसे ख़त्म कर सामाजिक सद्भाव स्थापित करने की प्रेरणा भी दी गयी.

नाटक मे स्वाति किरण, निमिषा नमन, हर्ष वर्धन, दिवाकर कुमार शर्मा, जीवन कुमार, धीरज कुमार, ज्योतीन्द्र, नंदन पाण्डेय, पप्पू कुमार, अमित कुमार, मोनी कुमारी आदि ने उत्कृष्ट अभिनय का प्रदर्शन किया.
धन्यवाद